श्रीराधा और कृष्ण : दिव्य युगल का अलौकिक प्रेम

भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परम्परा में राधा और कृष्ण का प्रेम एक साधारण प्रेम कथा नहीं है, यह परम प्रेम, अद्वैत भाव, और आत्मा के परमात्मा से मिलन की अमर अभिव्यक्ति है। यह प्रेम न तो लौकिक है, न ही सांसारिक नियमों से बंधा हुआ — यह तो भाव की पराकाष्ठा और भक्ति का चरम उत्कर्ष है।

प्रेम नहीं, आराधना है—राधा का कृष्ण में पूर्ण विलय

श्रीमती राधारानी को श्रीकृष्ण की आत्मा का स्वरूप माना गया है। ‘राधा’, जिसका अर्थ ही है—"जो कृष्ण को आकर्षित करती हैं’, वे केवल प्रिय नहीं हैं, वे स्वयं प्रेम की अधिष्ठात्री देवी हैं। श्रीकृष्ण के भीतर जो माधुर्य है, उस माधुर्य को सबसे पहले जिसने जाना, अनुभव किया, उसी का नाम है ‘राधा’।
गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय, वल्लभाचार्य की पुष्टिमार्ग परम्परा और निम्बार्क परम्परा—सभी इस बात पर एकमत हैं कि राधा ‘शक्ति' हैं और कृष्ण ‘शक्तिमान', और दोनों के संयोग से ही पूर्ण ब्रह्म की अभिव्यक्ति होती है। जहाँ राधा हैं, वहीं कृष्ण का स्वरूप पूर्ण है। यह जोड़ी ब्रह्माण्ड की सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

यह प्रेम सांसारिक नहीं—आत्मा की पुकार है

श्रीमद्भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गीता गोविंद और संत कवियों की रचनाओं में राधा–कृष्ण का प्रेम आत्मा और परमात्मा की भेंट का रूप लेता है। इस प्रेम में अधिकार नहीं, समर्पण है। यह प्रेम एकरस है—जिसमें कोई अपेक्षा नहीं, केवल अस्तित्व का लय है।
प्रसिद्ध कवि जयदेव ने अपने ग्रन्थ ‘गीता गोविंद' में लिखा है—
स्मर गरोळित लोचन राधिका, मधुर मनोहर मोहिनी रूपा।
ब्रजवन बिनोदन वल्लभ कृष्ण, मनसि मे स्फुरतु...

जयदेव कृत गीता गोविंद में यह प्रेम रास की भाषा में प्रकट होता है। यह रस श्रृंगार है, लेकिन ऐसा श्रृंगार जो आत्मा को चेतना से जोड़ता है, जिसमें प्रेम की भंगिमा दिव्य हो जाती है।

कृष्ण और राधा : दो नहीं, एक ही सत्ता के दो पक्ष

राधा और कृष्ण के बीच जो प्रेम है, वह द्वैत को समाप्त कर देता है। राधा स्वयं कहती हैं —
‘कृष्ण बिना मैं राधा नहीं, राधा बिना कृष्ण अधूरे।’
यह कथन इस रहस्य को उद्घाटित करता है कि उनका प्रेम एक-दूसरे में अस्तित्व को खो देने का नाम है। वह प्रेम जिसमें कोई अलगाव नहीं, कोई स्वार्थ नहीं—केवल पूर्ण समर्पण है।

संत कवियों की दृष्टि में राधा–कृष्ण का प्रेम

मीराबाई कहती हैं : पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
यहाँ ‘राम' से आशय है ‘कृष्ण’। उनका प्रेम लौकिक सीमाओं से परे आत्मा का परम अनुभव है।
सूरदास ने राधा-कृष्ण के बाल-लीलाओं से लेकर रास-लीला तक की ललित अनुभूतियाँ दीं, जिसमें प्रेम की कोमलता, वेदना और आध्यात्मिक माधुर्य एक साथ बहते हैं।

प्रेम का दर्शन—राधा-कृष्ण हमें क्या सिखाते हैं?

राधा और कृष्ण का प्रेम हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम वह नहीं जो अधिकार जताए, बल्कि वह है जो स्वयं को अर्पित कर दे, अहं को विसर्जित कर दे, और पूर्ण समर्पण में आनंद पाए।
उनका प्रेम न शारीरिक है, न सांसारिक; न बंधन है, न आवश्यकता; यह चेतना का मिलन है, जहाँ आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है; समकालीन संदर्भ में राधा–कृष्ण का प्रेम क्यों प्रासंगिक है?
आज जब प्रेम का अर्थ सिर्फ भौतिक आकर्षण या तात्कालिक सुख बनकर रह गया है, राधा-कृष्ण का प्रेम हमें सिखाता है कि प्रेम का सर्वोच्च रूप वह है जो मुक्त करता है, बांधता नहीं। वह प्रेम जो ईश्वर से जोड़ता है, और आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाता है।

निष्कर्ष

राधा और कृष्ण का प्रेम कोई कथा नहीं, एक जीवंत दर्शन है। यह प्रेम आत्मा की उस यात्रा का प्रतीक है जो परमात्मा में मिलन के लिए तड़पती है। इसीलिए राधा–कृष्ण का प्रेम भक्ति, समर्पण और योग की चरम सीमा है। यह वह संबंध है जिसमें प्रेम स्वयं ईश्वर बन जाता है।

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